अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

बुधवार, 16 जून 2010

जाते हैं.

एक झूला कल की आस झूलते जाते हैं,
हम अपना इतिहास भूलते जाते हैं.

खरबूजों की बात छोड़िये दुनिया में,
आसमान भी रंग बदलते जाते हैं.

हैं कुछ ऐसे सम्हल सम्हल कर गिरते हैं,
कुछ ऐसे गिर गिर के सम्हलते जाते हैं.

आज फिर नए फूल खिले हैं बगिया में,
जाते जाते लोग मचलते जाते हैं.

पाप पुण्य की हथेलिओं के बीच दबे,
मेरे सब अरमान मसलते जाते हैं.

जीत सका है कौन वक़्त की महफ़िल में,
खेल,जुआरी,दाँव बदलते जाते हैं.

हर्षवर्धन.

1 टिप्पणी:

  1. Didn't know you were such a good'unkavi'...always thought of you as my naughty bros naughty friend...really surprised at your deep thoughts...keep up your good work...

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