अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

रविवार, 10 अगस्त 2014

क्या?

बिक नहीं सकता जो, उस की क्या कीमत
भाव लगे जिसका,फिर उस का मोल क्या।

जूं भी न रेंगेगी          चीखों के बावजूद,
बहरों के मुहल्ले में,मुनादी का ढ़ोल क्या।

दिमाग़ कैसे  मापे, गहराईयाँ  दिल  की
ताक़त के तराज़ू में, चाहत का तोल क्या।

जज़्बात कहाँ समझें, सियासत के मसाइल
क्या फ़र्क जो तू बोले, अगर न बोल क्या।

रंग भी  न बदले  है, उस बेशर्म का चेहरा
जो साजिशें छुपी रहें खुल जाए पोल क्या।

शनिवार, 9 अगस्त 2014

ग़ज़ल।

इश्क़ को जिसकी जुस्तजू हर दम
उस मुलाक़ात का बहाना हूँ।

कहाँ लायक हूँ मैं ज़माने के
रस्म-ए-दुनिया को बस निभाना हूँ,

मैं अदीबों के साथ रहता हूँ
सुखनसाज़ी से आशिकाना हूँ।
अदीब=लेखक,सुख़नसाजी=लेखन।

नदी हूँ क्या चुनूँ मंजिल अपनी
समुन्दर की तरफ रवाना हूँ।

मैं भी आदम के सभी बच्चों सा
ज़रा सच हूँ ज़रा फ़साना हूँ।

ऐसी हसरत से मुझे देखते हो
क्या मैं गुजरा हुआ ज़माना हूँ।

करो न मुझसे होश की उम्मीद
निगह-ए-शोख का निशाना हूँ।

लगा सब की तरह उधेड़ बुन में
मैं भी जीवन का ताना बाना हूँ।

तेरे होंठों पर कभी आऊँगा
अभी अनजान एक तराना हूँ।

बुधवार, 28 अगस्त 2013

आईना है ये कलाम.


कागज़ी संवेदना, है कागज़ी सब इंतज़ाम,
कागज़ी नारे तुम्हारे, हैं कागज़ी वादे तमाम.

है नहीं जो, बाँटते हो, आप वो लोगों के बीच,
जो है वो, मिलबाँट कर खाएगा हमारा निजाम.

मत के मतवालों ने कैसा कायदा ये कर दिया,
नौकरों का घर पे कब्ज़ा और मालिक लामुकाम.

हम तो डर जाते सिपाही दूर से ही देख कर,
और अपना वो सिपाही चोर को करता सलाम.

और कब तक ज़ब्त अपना आजमाते जाओगे?
आज के हालात हैं अपनी ही चुप्पी का इनाम.

हम भी बगलें झाँकते हैं शक्ल इसमें देखकर,
आज की तारीख का एक आईना है ये कलाम.

लामुकाम= बेघर.
ज़ब्त=धैर्य.
कलाम=कविता.

सोमवार, 29 जुलाई 2013

ग़ज़ल

         

               ग़ज़ल


हो गयी है पीर, पर्वत भी पिघलने लग गया,
नींद में खलल पड़ा, इंसान पर क्या जग गया.

तूने क्या बरबाद पूरा, घर पुराना कर लिया ?
तू जो निकला ढूँढने, तारों में फ़िर इक घर नया.

आज की इस ज़िंदगी का दायरा भी है अजीब,
घर से निकला रिज़्क पर, रोटी कमाई घर गया.

होने का जिसको गुमाँ था, लोग बोले उसके बाद,
चार दिन वो भी जिया, सबकी तरह फ़िर मर गया.

कनखियों से देखना वो, आपका मेरी तरफ़.
यूँ लगा जैसे पुराना ज़ख्म कोई भर गया.

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

सतह पर.


सतह पर.

तुम, जो दिखते भी नहीं हो,
हावी रहते हो मुझपर.
मुझपर, जो दिखता है.
कितनी आसानी से बदल जाते हो तुम.
दिल बन कर, करवा लेते हो वो,
जो अतार्किक है.
और कभी दिमाग बन कर,
करवाते हो वह सब,
जो तार्किक तो है,
परन्तु निंदनीय.
और सजा भोगता हूँ मैं.
मैं, जो दिखता है,
सतह पर.

सोमवार, 10 सितंबर 2012

तुमको और मुझको.



इंसानियत के नाते,अपनी ख़ुदी से प्यार,
तुमको भी बेशुमार है,मुझको भी बेशुमार.

चोर और लुटेरे में एक को चुन लें,
तुमको भी इख़्तियार है, मुझको भी इख़्तियार.

राज करने वाले,आला दिमाग़ पर,
तुमको भी ऐतबार है, मुझको भी ऐतबार.

हम पे चोट कुछ नहीं,मैं पे एक वार,
तुमको भी नागवार है,मुझको भी नागवार.

हालात को सुधारने आएगा मसीहा,
तुमको भी इन्तज़ार है,मुझको भी इन्तज़ार.








शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

खंज़र न मार.


मुफलिसी से बेदिली, पसरी थी घर में, चार सू,
आज वो बाज़ार से, ले आया कुछ रुपयों का प्यार.

जिस्म है, ज़मीर भी, ममता भी, बिकने में शुमार,
वाह री दुनिया की तिज़ारत, आह इसका कारोबार.

है सभी कुछ पास, या, कुछ भी नहीं है इसके पास,
इक मरुस्थल के लिए, क्या है खिज़ा, है क्या बहार.

लुट भी जाने दो, दीवाने को, भरे बाजार में,
यार से, गमख्वार से,कब तक रहे वो होशियार.

रहबरी से राहबर, बेज़ार मुझको यूँ न कर,
थपथपाने के बहाने, पीठ पर खंज़र न मार.


मुफलिसी=गरीबी, चार सू=हर तरफ़, तिज़ारत=व्यापार,
खिज़ा=पतझड़, घम्ख्वार=दुःख का सांझेदार, रहबरी=नेतृत्व,
राहबर=नेतृत्व करने वाला, बेज़ार=उदासीन.

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

शहर रुसवा हो गया


मुतमईन थे लोग, जब तक लड़ रहे थे आप मैं,
प्यार जो हम में बढ़ा, तो शहर रुसवा हो गया.

देखिये नाज़ुक है कितनी, फिरकापरस्तों की नाक,
तुम जो मुझसे मिलने आये, शहर रुसवा हो गया.

चैन था की एक अंधा बाँटता था रेवड़ी,
देख कर बंटने लगी, तो शहर रुसवा हो गया.

दाम बढता ही रहा, हर शै का, पर चलता रहा,
जब पसीने का बढ़ा, तो शहर रुसवा हो गया.

लुत्फ़ जिन बदनाम गलियों का अँधेरे में लिया,
गलियाँ वो रोशन हुईं, तो शहर रुसवा हो गया.

बातों में सब कर रहे थे पैरवी इन्साफ की,
न्याय की चलने लगी तो शहर रुसवा हो गया.

उसके हिस्से तंज़ थे गैरों के भी अपनों के भी,
उसने जब अपनी कही, तो शहर रुसवा हो गया.

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

क्रिकेटनीती



नेट प्रक्टिस से दोस्तों,चले नहीं अब काम,
पिच पर आ दे दीजिए, सपने सर-अंजाम.

बाउंडरी पर लीजिए, बेईमानों का कैच,
सही वक्त है देश को, जिता दीजिए मैच.
रष्टाचारी कौम को,करिये अब रन आउट,
मिलने ना पाए इन्हें,बेनेफिट ऑफ डाऊट.
संसद में कोई अगर, फेंके जो नो बौल,
अम्पायर बन जाइये, करिये फाउल कॉल.
मैच फिक्स होते रहे, अगर इलेक्शन बाद,
खिचड़ी सरकारें बनें, देश करें बरबाद.

रविवार, 25 मार्च 2012

अखबार



अखबार में लिपटी थी, कुछ दिन की बासी रोटी,

अखबार कह रहा था, कम हो गयी गरीबी.
गुलाब सी फितरत है, काँटों से घिर गया हूँ,
जो काँटा चुभ रहा है, वो है मेरा करीबी.
ताना बाना लेकर, जो पैरहन* बुनता है,
उसका बदन है नंगा, ये कैसी बदनसीबी.
मैं सारे ज़माने के रंगों से होली खेलूँ
रंग अपना भूल जाऊँ, ऐसा न हो कभी भी.
सब गुजर रहे हैं, लगता है कि वो गुजरा,
है वक्त नाम जिसका, उसकी यही है खूबी.

*वस्त्र.
कार्टून बामुलाहिजा से साभार.