अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

रविवार, 28 नवंबर 2010

और है.

दिल की फ़र्माइश है सर आँखों मगर,
एक पूरी हो तो फ़िर इक और है.

ख़त्म सुनता था हुए राजा नवाब,
पर हक़ीक़ी वाक़या कुछ और है.

आदमी अब क्या करे शर्मो लिहाज,
जिस भी सूरत जीतने का दौर है.

तुम भले इन्कार कर लो आग से,
कह रहा उठता धुवाँ कुछ और है.

बेअसर है झिंगुरों का सा रियाज़,
सुर को साधे जो गला कुछ और है.

खुश वो,जो बिक जाए ऊँचे दाम में,
आज तो बाज़ार ही सिरमौर है.