अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

बुधवार, 16 जून 2010

क्या देखा?

हम से मत पूछिये साहब के हम ने क्या देखा,
हम ने दुनिया के रंग-ओ-बू का तमाशा देखा.

भरी बहार में देखे कई ग़ुल मुरझाते,
कागज़ी फूलों को ग़ुलदानों में सजता देखा.

दहेज़ लेता हुआ मजनूँ हम को आया नज़र,
हम ने एक लैला को तन्दूर में जलता देखा.

हम्ने देखी है एक हद से गुजरती हुई भूख,
तिफ़्ल का ग़ोश्त भी बाज़ार में बिकता देखा.

हुआ जब किस्सा-ए-तिज़ारते ताबूत का ज़िक्र,
हमने सरहद पर अपना लाडला डटा देखा.

हम से मत पूछिये साहब के हम ने क्या देखा,
हम ने दुनिया के रंग-ओ-बू का तमाशा देखा.

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