अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

खेल खेल में.

हमारे देश में आजकल ४ खेल चर्चा में हैं. इनमें से २ अन्तर्राष्ट्रीय हैं और २ राष्ट्रीय. कामनवेल्थ और आतंकवाद अन्तर्राष्ट्रीय खेल हैं, जिनमें परस्पर प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है. अयोध्या पर फ़ैसला एवं बाढ़ राष्ट्रीय खेल हैं, जिनमें परस्पर यह सम्बन्ध है कि दोनों ही मासूम ज़िन्दगियाँ लीलने को आतुर हैं. इन ४ खेलों के बहाने कई ’उप-खेल’ भी खेले जा रहे हैं जिन से समाज के अगुवाओं के आर्थिक एवं राजनीतिक लाभ पर असर पड़ता है. इन खेलों से आम जनों के जीवन पर भी व्यापक असर पड़ता है परन्तु वह महत्वपूर्ण नहीं माना जाता. उनके जीवन पर तो छोटी-छोटी बातों,उदाहरण के लिये-तेल के दाम बढ़ जाना अथवा गोदामों की कमी के कारण अनाज का सड़ जाना, से भी व्यापक असर पड़ जाता है.
तो पहले हम अन्तर्राष्ट्रीय खेलों की बात करते हैं. राष्ट्रकुल उन राष्ट्रों का समूह है जो कभी साम्राज्यवादी युग में ब्रितानी हुकूमत के आधीन थे. यह देश आपस में खेल खेलते हैं. इन खेलों के आयोजन को ’कामनवेल्थ गेम्स’ कहा जाता है. बड़ी मुश्किलों से हमारा देश इस बार इन खेलों के आयोजन पर अधिकार कर पाया है. कहा जाता है कि इस आयोजन से देश में पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, विदेशी मुद्रा अर्जित की जाएगी और खेल भावना को प्रोत्साहन मिलेगा. खबरची बता रहे हैं कि राजधानी में देसी एवं विदेशी सेक्स वर्करों का जमावड़ा लग चुका है, आयोजन में करोड़ों रुपयों की धाँधली हो चुकी है, मेहमान देशों के खिलाड़ी इन्तज़ामों से असन्तुष्ट हैं और कुछ देशों ने तो खेलों में भाग लेने से इन्कार कर दिया है. हमारे देश की एक नामी खिलाड़ी ने आयोजन के इन्तज़ामात पर विपरीत टिप्पणी की थी पर जगविदित कारणों से वापस ले ली. आम जनों को ट्रैफ़िक जाम और डेंगू की सौगात मिली है. इस आयोजन से क्या फ़ायदे होंगे यह तो पता नहीं पर क्या क्या नुक्सान हुए हैं इसका अन्दाज़ा लगाने के लिये आयोजन के समापन के बाद एक कमेटी गठित की जायेगी, ऐसा हमारे अगुवाओं ने कहा है.
दूसरा अन्तर्राष्ट्रीय खेल है आतंकवाद, इस खेल के लिये स्टेडियम की आवश्यकता नहीं होती. इसे दुनिया के कई हिस्सों में खेला जाता है, जिनमें प्रमुख हैं इस्राईल, फ़िलिस्तीन, अफ़गानिस्तान, इराक़, पाकिस्तान भारत इत्यादि. ये खेल कहीं पर धर्म के नाम पर खेला जाता है तो कहीं ज़मीन के नाम पर. इस खेल में शामिल कई खिलाड़ियों को यह भी पता नहीं होता कि वो खेल क्यों रहे हैं,और किसके खिलाफ़ खेल रहे हैं. इन खिलाड़ियों में से बहुतों की उम्र में बच्चे लुक्का छुपि खेला करते हैं, परन्तु धन्य हैं इनके नायक जो इनके हाथों में हथियार थमाकर इन्हें अपनी ढ़ाल बना लेते हैं.इस खेल के रेफ़री को भी अनेकों बार इस खेल का खामियाज़ा भुगतना पड़ा है, तभी उसने फ़ाऊल की सीटी बजाई अन्यथा उसे खेल में फ़ाऊल नज़र ही नहीं आता था. इस खेल में दुनिया के तमाम हिस्सों को नुक्सान पहुँचा है, फ़ायदा हुआ तो केवल हथियारों के निर्माणकर्ताओं और उनके सौदागरों का. ध्यान रहे कि उनके हथियार ना तो धर्म पहचानते हैं न ही ज़मीन पर खींची गई सरहदों का लिहाज करते हैं. जब तक हथियार बनेंगे, हथियार बनाने के पीछे की नीयत बनी रहेगी, सत्ता का लालच बना रहेगा, खेल भी बदस्तूर ज़ारी रहेगा.
अब राष्ट्रीय खेलों की बात करते हैं. पहले बाढ़ के खेल से शुरुआत करते हैं. देश में इस खेल की शुरुआत मान्सून के आगमन के साथ साथ होती है. सबको पता होता है नदियाँ उफ़नाएँगी और पहाड़ दरकेंगे, बस ये अन्दाज़ा नहीं होता कि किस सीमा तक. सारा खेल इस ही बात पर आधारित है. नदियाँ कम उग्र हुईं तो खिलाड़ियों को कम फ़ायदा होता है, ज़्यादा हुईं तो कहना ही क्या. हमारे समाज का तकरीबन हर हिस्सा इस खेल में भाग लेता है. लाला, बाबू, अफ़सर, एन.जी.ओ, पत्रकार, राजनीतिबाज, लेखक, सब ही इस खेल में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं. इस खेल का नियम है कि खिलाड़ी खेल की स्थितिओं से निर्लिप्त रहें. खेल गोटों के साथ खेला जाता है, और गोटों का क्या है, कई गोटें खेल खेल में खेल से बाहर हो जाती हैं. उनके घर छिन जाते हैं, खेत बह जाते हैं, मवेशी बह जाते हैं, परिवार बिछुड़ जाते हैं. गोटों को मुआवज़े का आश्वासन मिल जाता है, और खिलाड़ियों को मुआवज़ा.
दूसरा राष्ट्रीय खेल बहुत पुराना है परन्तु इसको नये नये बहानों की जब तब आवश्यकता पड़ती रहती है. इस बार का बहाना है अयोध्या विवाद पर हाई अथवा सुप्रीम कोर्ट का निर्णय. इस खेल ने पूर्व में सत्ता के उलट फ़ेर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. कई खेल ऐसे होते हैं जिनमें इन्सानी खून का बहना आवश्यक होता है. इतिहास गवाह है कि ’ग्लैडिएटरों’ ने हमेशा शासकों के मनोरंजन के लिये वहशी जानवरों से लड़कर अपना खून बहाया है. तब शासकों केर हित साधन के लिये खून बहा दिया जाना क्या बड़ी बात है, और वो भी आपस में लड़कर. कम से कम हम वहशी जानवरों से तो नहीं लड़ रहे. प्रार्थना है कि इस बार ऐसा ना हो, उम्मीदें भी हैं. बाढ़ के खेल में काफ़ी नुक्सान हुआ है, शायद खिलाड़ी ज़्यादा नुक्सान के भय से ही इस खेल में हिस्सा ना लें.

वो जिसके नाम से इंसानियत बँट जाये ख़ेमों में,
वो मज़हब आपका होगा,हमें फ़ुर्सत नहीं है.

शनिवार, 11 सितंबर 2010

सुना है...

"बबा,हो सकता है कि इस में तुम जीत जाओ, पर मक़सद हार जाएगा". तब ही समझ गया था कि ये आदमी अपनी जीत पर नहीं,समाज की जीत पर विश्वास करता है. दो तीन वर्ष ही हुए थे उनसे मुलाक़ात हुए. उन्हें देखते, उनके बारे में सुनते सुनते ना जाने कितने बरस हो गये थे. जो कुछ भी काला सफ़ेद सुना था उनके बारे में, वो देख भी रहा था,और अपनी बुद्धी की सीमारेखा में उसका आँकलन भी कर रहा था. उनके आन्दोलनरत कलाकार रूप और कवित्त पर टिप्पणी करने योग्य खुद को समझना मेरी मूर्खता होगी. उन्हं प्रिय कहना चाहूँगा, मार्गदर्शक कहना चाहूँगा,प्रेरणास्रोत कहना चाहूँगा. उन्होंने कई बार हमारी कोशिशों की पीठ थपथपाई और अनेकों बार दिशादर्शन के लिये उनके कान भी उमेठे. सुनता हूँ की भूतकाल में उनकी कोशिशों को इस तरह की सहूलियत नहीं मिली. इसके उलट, जब वो रंगभूमि की तलाश में थे, एक नामी गिरामी संस्था ने उनके लिये प्रवेश निषिद्ध किया. उनकी सारी अच्छाई , क़ाबिलियत, सादगी, क्षमता और व्यक्तित्व एक ओर, और उनकी मयनोशी एक ओर. तत्कालीन रंगकर्म के ठेकेदारों ने आदत को फ़ितरत से ज़्यादा महत्व दिया. रंग का सर्जक और दर्शक, दोनों ही लम्बे अर्से तक ऐसे स्रिजन से महरूम रहे, जो शायद हमारे इतिहास को और महत्वपूर्ण और सारगर्भित बनाता.

ये मसायले तसव्वुफ़,ये तेरा बयान ग़ालिब,
हम तुझे वली समझते,जो न बादाख़्वार होता.

नदी का रास्ता भी कोई रोक पाया है भला. उनके स्रिजन का बहाव चलता रहा, उनके गीत आन्दोलन का अपरिहार्य अंग बन गये, उनके हुड़के की थाप आन्दोलन का आह्वान बन गई और उनकी आवाज़ हज़ारों आन्दोलनकारियों की आवाज़ का पर्याय बन गयी. रंगकर्म से वंचित व्यक्तित्व जनकवि बन गया.

’दावानल’ में पढ़ा कि ८० के दशक में वो उत्तरकाशी के बाढ़्पीड़ितों की मदद करने वहाँ पहुँचे थे. मैं भी तब वहीं था. कक्षा १ के विध्यार्थी की कच्ची उम्र की यादें हैं, ज़रूरत के सामान से भरा एक झोला हमेशा तय्यार रहता था और गंगा की आवाज़ उग्र होते ही लोग बिना सोचे समझे ऊँची जगहों की तरफ़ दौड़ पड़ते थे. वो अपनी जान जोख़िम में डालकर औरों के जीवनरक्षण का ध्येय लिये वहाँ मौजूद थे. कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने जनान्दोलन का नेत्रत्व किया और उसके श्रेय स्वरूप ज़िन्दगी किराए के मकान में गुज़ार दी. फूल बोए, बाँट दिये, रहे काँटे सो सहेजकर अपने झोले में रख लिये, बीड़ी के बन्डल और दारू के अद्धे के साथ.

"मन मैला और तन को धोए.........". जुमले यूँ भी सुने हैं. "यार एक ऐसा समय भी आया जब गिर्दा नहाते ही नहीं थे...... मै...ले कपड़े........". सोचता हूँ क्या कारण रहा होगा? पाँच मिनट तो लगते हैं नहाने में, और एक बाल्टी पानी. ज़रूर वो लोगों को खुद से दूर रखना चाहते होंगे..., पर लोगों के लिये स्वयं को भूल जाने वाला व्यक्ति उन्हें अपने से दूर क्यों रखना चाहेगा? हो सकता है कुछ लोगों की उनके कलाकार के प्रति असहिष्णुता इस अबूझे विद्रोह का कारण रही हो. उन्होंने सोचा हो कि मैली सोच, मैले वतावरण, मैले पर्यावरण और मैले समाज में एक आदमी का बदन मैला रह जाने से क्या फ़र्क पड़ जाने वाला था. आखिर आत्मा तो उनकी साफ़ ही थी.

हर्षवर्धन