अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

शनिवार, 19 जून 2010

दोस्ती ख़त्म.

तुम्हारी मेरी दोस्ती आज से ख़त्म.

कारण.


जब भी दाद की आरज़ू में मैंने कोइ शेर पढ़ा ,
तुम और सभी लोगों की तरह खामखाँ हँसते रहे.

तुम्हारी ईमानदारी ने तुम्हारा हाजमा खराब किया है,
मेरा ज़रा सा झूठ तुम्हारे पेट में ऐंठन पैदा करता है.

तुम मेरे अहं की ज़रा सी भी परवाह नहीं करते हो,
मेरी मदद लेने में तुम्हारी खुद्दारी आड़े आ जाती है.

मैं सारा दिन जिन सुडोकू पहेलियों को सुलझाता हूँ,
उन्हें तुम बेदर्दी से वक़्त की बर्बादी करार देते हो.

मैं सुभीते के साथ अपने पिता के पैरों पर चलता हूँ,
तुम मुझे खुद के पैरों पर खड़े होने की सलाह देते हो.

जो डिग्रियाँ मेरे बैठक की दीवरों पर शान से सजी हैं,
तुम जानते हो उन्हें मैंने किन तरकीबों से हासिल किया है.

मौका आने पर तुमने हमेशा नमकीन की पेशकश की,
असली मद का खर्च हमेशा मेरी ही जेब से हुआ.

इसलिये

तुम्हारी मेरी दोस्ती आज से ख़त्म

हर्षवर्धन.

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