अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

शनिवार, 22 मई 2010

जब जब मन्दिर मस्ज़िद टूटे,हमने फोटो खींच ली,

जब जब मन्दिर मस्ज़िद टूटे,हमने फोटो खींच ली,
जब अपने अपनो से रूठे,हमने फोटो खींच ली,

मिलकर उसको लूट रहे थे,बूढी मा से रूठ रहे थे,
जब तुम भाइ लडे आपस मे,हमने फोटो खींच ली.

पहले पहल वो उनसे मिलना,प्यार के पहले फूल का खिलना,
जब तुम पहली पिकनिक में थे,हमने फोटो खींच ली.

चाँदी की भारी खन खन में,प्रेम गीत को भूले क्षण में,
जब तुम अपने फेरों पर थे,हमने फोटो खींच ली.

पहली घूस जो तुमने दी थी,पहली घूस जो तुमने ली थी,
जब तुम पहली कार में बैठे,हमने फोटो खींच ली.

तुमने जुगत लगानी ही थी,पदोन्न्ती तो पानी ही थी,
जब जब तुमने जुगत लगाइ,हमने फोटो खींच ली.

जब तुमने हथियार खरीदे,एक नही सौ बार खरीदे,
जब जब तिलक लगा थैली का,हमने फोटो खींच ली.

हर्षवर्धन.

मिटटी के गोले में आग भरे बैठा है

मिटटी के गोले में आग भरे बैठा है,
फ़िर भी धन-ऋण-गुणा-भाग करे बैठा है.

नक़्शे मिटाकर फिर नक़्शे बनाने को,
ख़ुद पर ही दाग़ने बारूद भरे बैठा है.

हर एक पर हर कोई उंग्लियाँ उठाता है,
हर कोइ हाथों पर हाथ धरे बैठा है.

चाँद पर तो पहुँचा पर अक़्ल नहीं आई है,
मकाँ ठन्डे सारी दुनिया ग़र्म करे बैठा है.

गन्डे-तावीज़ों से अब भी बहल जाता है,
सारी पढ़ाई फिज़ूल करे बैठा है.

हर्षवर्धन.

शुक्रवार, 21 मई 2010

मेरे भाई.

तुम खुद से कुछ बेइमानी तो करते हो,
खूबी तुम में लाख सही मेरे भाई.

वक़्त रहा पर हक़ यारों का नही रहा,
ले लेते कुछ खोज-खबर मेरे भाई.

सदर बने जो वो तो ऐसे ख़ास न थे,
जो देखे हैरान समय की चतुराई.

जाम रहे पर हमप्याले वो नही रहे,
शाम तुम्हारी ख़ूब रही मेरे भाई.

ख़्वाब रहे पर ख़्वाब हमारे बिछुड़ गए,
राह ये तुमने ख़ूब चुनी मेरे भाई.

साथ रहा पर साथ हमारा नहीं रहा,
दिल की दिल सुनता तो था मेरे भाई.

बात रही पर बीच हमारे नहीं रही,
तेरी इमारत ख़ूब बनी मेरे भाई.

हर्षवर्धन.

पिन्जरे में क़ैद है.

क्या रोशनाई आपकी, गिरवी है कहीं पर,
वर्ना ग़ज़ल का शेर, क्यों पिन्जरे में क़ैद है.

नाड़ी टटोलना भी, उसको नहीं आता,
वैसे वो मेरे गाँव का, सयाना वैद है.

उँगली बहुत उठाई तूने, मेरे खेल पर,
कर के दिखा, अब तेरे पाले में गेंद है.

तूने जो हाथ पोंछे, लिबास-ए-यार पर,
यूँ ही तो नहीं पैरहन, तेरा सुफ़ैद है.

मेज़ पर जमी थी मैख्वारों की टोली,
दीवार पर लिखा था,मदिरा निषेध है.


अक्ल रख छोड़ी है अपनी, ताक पर मैंने,
बची खुची पेट के झगड़े में क़ैद है.

सोमवार, 3 मई 2010

Introduction

I am from Nainital, Uttarakhand and have in the past benn intrumental in creating "Aaj kainchi dham mein".A bhajan album dedicated to Baba neem karori maharaaj.Recently I have made a film called "Pahari filam" which comically reflects the condition of film and film makers in uttarakhand. To watch some of the artwork http://www.orkut.co.in/Main#FavoriteVideos?uid=2927706194026738318