अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

शनिवार, 22 मई 2010

जब जब मन्दिर मस्ज़िद टूटे,हमने फोटो खींच ली,

जब जब मन्दिर मस्ज़िद टूटे,हमने फोटो खींच ली,
जब अपने अपनो से रूठे,हमने फोटो खींच ली,

मिलकर उसको लूट रहे थे,बूढी मा से रूठ रहे थे,
जब तुम भाइ लडे आपस मे,हमने फोटो खींच ली.

पहले पहल वो उनसे मिलना,प्यार के पहले फूल का खिलना,
जब तुम पहली पिकनिक में थे,हमने फोटो खींच ली.

चाँदी की भारी खन खन में,प्रेम गीत को भूले क्षण में,
जब तुम अपने फेरों पर थे,हमने फोटो खींच ली.

पहली घूस जो तुमने दी थी,पहली घूस जो तुमने ली थी,
जब तुम पहली कार में बैठे,हमने फोटो खींच ली.

तुमने जुगत लगानी ही थी,पदोन्न्ती तो पानी ही थी,
जब जब तुमने जुगत लगाइ,हमने फोटो खींच ली.

जब तुमने हथियार खरीदे,एक नही सौ बार खरीदे,
जब जब तिलक लगा थैली का,हमने फोटो खींच ली.

हर्षवर्धन.

1 टिप्पणी:

  1. दाज्यू आपने समाज में फैले भ्रष्टाचार को आधार बना कर बड़ी चुटीली कविता लिखी है.. अच्छी लगी..

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