अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

शुक्रवार, 21 मई 2010

पिन्जरे में क़ैद है.

क्या रोशनाई आपकी, गिरवी है कहीं पर,
वर्ना ग़ज़ल का शेर, क्यों पिन्जरे में क़ैद है.

नाड़ी टटोलना भी, उसको नहीं आता,
वैसे वो मेरे गाँव का, सयाना वैद है.

उँगली बहुत उठाई तूने, मेरे खेल पर,
कर के दिखा, अब तेरे पाले में गेंद है.

तूने जो हाथ पोंछे, लिबास-ए-यार पर,
यूँ ही तो नहीं पैरहन, तेरा सुफ़ैद है.

मेज़ पर जमी थी मैख्वारों की टोली,
दीवार पर लिखा था,मदिरा निषेध है.


अक्ल रख छोड़ी है अपनी, ताक पर मैंने,
बची खुची पेट के झगड़े में क़ैद है.

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