ग़ज़ल।
इश्क़ को जिसकी जुस्तजू हर दम
उस मुलाक़ात का बहाना हूँ।
कहाँ लायक हूँ मैं ज़माने के
रस्म-ए-दुनिया को बस निभाना हूँ,
मैं अदीबों के साथ रहता हूँ
सुखनसाज़ी से आशिकाना हूँ।
अदीब=लेखक,सुख़नसाजी=लेखन।
नदी हूँ क्या चुनूँ मंजिल अपनी
समुन्दर की तरफ रवाना हूँ।
मैं भी आदम के सभी बच्चों सा
ज़रा सच हूँ ज़रा फ़साना हूँ।
ऐसी हसरत से मुझे देखते हो
क्या मैं गुजरा हुआ ज़माना हूँ।
करो न मुझसे होश की उम्मीद
निगह-ए-शोख का निशाना हूँ।
लगा सब की तरह उधेड़ बुन में
मैं भी जीवन का ताना बाना हूँ।
तेरे होंठों पर कभी आऊँगा
अभी अनजान एक तराना हूँ।
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