अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

रविवार, 11 दिसंबर 2011

मकसद.

मेरा मकसद है मेरे राज पर न आँच आए,

ये और बात मेरी बात सही हो कि न हो.

जो हैं गरीब तो सदियों से मसीहा भी हैं,

ये और बात है कंधों पे सलीब हो कि न हो.

रोज़ी,रोटी,मकान,कपड़ा कागज़ों पर है,

ये और बात है हमको नसीब हो कि न हो.

फिज़ा में तैर रही एक बुज़ुर्ग बीन की धुन,

ये और बात है भैसों पे असर हो कि न हो.

राज लोगों का है लोगों के लिए लोगों से,

ये और बात है लोगों की क़द्र हो कि न हो.

2 टिप्‍पणियां:

  1. wow harsh..bahut samay baad..last lines are so apt..logon ki kadr ho ya na ho.. please keep writing, i dont like to see you in hibernation

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