अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

बरसों लगे.......

आदमी को

जानवर से

आदमी

बन जाने में

बरसों लगे.

लेकिन

अब भी

उसे

आदमी से

जानवर

बन जाने में

लगता है

एक पल.

9 टिप्‍पणियां:

  1. हर्ष जी
    सटीक कहा आपने.....बुनियादी गुण इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ते :) ...करारा व्यंग ...आदमी और उसकी आदमियत पर

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  2. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना

    नववर्ष की शुभकामनायें ।

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  3. सदा जी मुदिता जी बहुत बहुत शुक्रिया.

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  4. सटीक ...सुन्दर शब्द चित्र

    नव वर्ष की शुभकामनाएँ

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  5. बिल्कुल सही.
    नववर्ष आपको शुभ हो...

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  6. वाह वाह, क्या सच्चाई बयान की है आपने.वो भी इतने कम शब्दों में.

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  7. आप को सपरिवार नव वर्ष २०११ की ढेरों शुभकामनाएं.

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  8. संगीता जी ,सुशील जी ,कुंवर जी,रश्मि जी और संजय जी.
    आप से सुधिजन जब प्रेरणा देते हैं तो बल मिलता है.

    धन्यवाद

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