अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

सतह पर.


सतह पर.

तुम, जो दिखते भी नहीं हो,
हावी रहते हो मुझपर.
मुझपर, जो दिखता है.
कितनी आसानी से बदल जाते हो तुम.
दिल बन कर, करवा लेते हो वो,
जो अतार्किक है.
और कभी दिमाग बन कर,
करवाते हो वह सब,
जो तार्किक तो है,
परन्तु निंदनीय.
और सजा भोगता हूँ मैं.
मैं, जो दिखता है,
सतह पर.

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