अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

सोमवार, 10 सितंबर 2012

तुमको और मुझको.



इंसानियत के नाते,अपनी ख़ुदी से प्यार,
तुमको भी बेशुमार है,मुझको भी बेशुमार.

चोर और लुटेरे में एक को चुन लें,
तुमको भी इख़्तियार है, मुझको भी इख़्तियार.

राज करने वाले,आला दिमाग़ पर,
तुमको भी ऐतबार है, मुझको भी ऐतबार.

हम पे चोट कुछ नहीं,मैं पे एक वार,
तुमको भी नागवार है,मुझको भी नागवार.

हालात को सुधारने आएगा मसीहा,
तुमको भी इन्तज़ार है,मुझको भी इन्तज़ार.








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