अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

शहर रुसवा हो गया


मुतमईन थे लोग, जब तक लड़ रहे थे आप मैं,
प्यार जो हम में बढ़ा, तो शहर रुसवा हो गया.

देखिये नाज़ुक है कितनी, फिरकापरस्तों की नाक,
तुम जो मुझसे मिलने आये, शहर रुसवा हो गया.

चैन था की एक अंधा बाँटता था रेवड़ी,
देख कर बंटने लगी, तो शहर रुसवा हो गया.

दाम बढता ही रहा, हर शै का, पर चलता रहा,
जब पसीने का बढ़ा, तो शहर रुसवा हो गया.

लुत्फ़ जिन बदनाम गलियों का अँधेरे में लिया,
गलियाँ वो रोशन हुईं, तो शहर रुसवा हो गया.

बातों में सब कर रहे थे पैरवी इन्साफ की,
न्याय की चलने लगी तो शहर रुसवा हो गया.

उसके हिस्से तंज़ थे गैरों के भी अपनों के भी,
उसने जब अपनी कही, तो शहर रुसवा हो गया.

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