अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

सोमवार, 17 जनवरी 2011

मगर बदनाम है.....पैसा.

लुभाता है, सताता है, रुलाकर फिर हंसाता है,

बिगाड़े भी, बनाता है, ऐसा हुक्काम है.

पैसा.

बड़े दरबार में , अदालतों में, और खुदा के घर,

कभी आता था दबे पाँव, अब सरेआम है.

पैसा.

मुल्क ने मेरे भी, तस्वीर उसकी खींच डाली है,

रिआया की, कुल जमा सोच का अंजाम है.

पैसा.

यही इक दूसरे पर आपकी उंगली उठाता है.

मिले शहर के हर एक घर, मगर बदनाम है.

पैसा.

ज़रूरी बेज़रूरी,ये सभी, इसपर मुन्ह्स्सर है,

तुम्हारी शख्सियत की तोल का आयाम है.

पैसा.

23 टिप्‍पणियां:

  1. घर से निकालकर आदमी को दौडाता है पैसा.
    अच्छी प्रस्तुति...

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  2. अच्छी कविता है .लिखते रहो मेरे भाई.

    पैसे की महिमा निराली है
    उसका कोई नहीं जिसकी जेब खाली है.

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  3. आज के समय में पैसा ही सब कुछ होगया है..सटीक प्रस्तुति

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  4. हर्ष जी ,

    ज़रूरी बेज़रूरी,ये सभी, इसपर मुन्ह्स्सर है,

    तुम्हारी शख्सियत की तोल का आयाम है.

    पैसा.

    बहुत खूब ....सही फरमाया आपने ...

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  5. सही कहा. पैसा सर्वोपरि हो गया है.

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  6. तुम्हारी शख्सियत की तोल का आयाम है पैसा
    यथार्थ की सुन्दर अभिव्यक्ति !
    'यस्य गृहे टका नास्ति हाटके टकटकायते'

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  7. बड़े दरबार में , अदालतों में, और खुदा के घर,

    कभी आता था दबे पाँव, अब सरेआम है.

    पैसा.
    सत्य वचन ...

    पर इसे ज़रा समझायिए:
    रिआया की, कुल जमा सोच का अंजाम है.

    पैसा.

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  8. आभा जी,
    जिस देश के अधिकतम शिक्षा संस्थान,एन जी ओ ,इत्यादि इत्यादि का मुख्य उद्देश्य पैसे बढ़ाने का हो वहाँ पर मैं और कह भी क्या सकूंगा.शिक्षा का उद्देश्य रोज़गार,नौकरी का उद्देश्य सेवा के स्थान पर धनोपार्जन.और क्या कहूँ?

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  9. ek ankavi kaa ye bayaan....kavi hotaa to naa jaane kyaa kahataa ...vaah bhaayi vaah....!!!!

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  10. पैसे की महिमा पर
    बहुत अच्छी और सटीक प्रस्तुति ...

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  11. So true Harsh Da....

    Money is power, freedom, a cushion, the root of all evil, the sum of blessings.

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  12. सही कहा आज के समय में पैसा ही सब कुछ होगया है| सटीक प्रस्तुति|

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  13. जैसे आता है, वैसे ही जाता भी है पैसा -- दबे पाँव....

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  14. I don't know what you call it in the classification of poetry, but for now, I will call it 'Realism Poetry'...And you definitely are making a strong mark in this field..Without extrapolation, you hit hard the reality of life in such a poetic way...Wonderful

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  15. प्रिय बंधुवर हर्षवर्धन वर्मा जी
    नमस्कार !

    लुभाता है, सताता है, रुलाकर फिर हंसाता है,
    बिगाड़े भी, बनाता है, ऐसा हुक्काम है पैसा


    सच कहते हैं जनाब ! पैसे का खेल निराला है …
    … और पैसा बोलता है …:)

    ख़ूबसूरत ब्लॉग और प्यारी रचनाएं !
    हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  16. जात - पांत न देखता, न ही रिश्तेदारी,
    लिंक नए नित खोजता, लगी यही बीमारी |

    लगी यही बीमारी, चर्चा - मंच सजाता,
    सात-आठ टिप्पणी, आज भी नहिहै पाता |

    पर अच्छे कुछ ब्लॉग, तरसते एक नजर को,
    चलिए इन पर रोज, देखिये स्वयं असर को ||

    आइये शुक्रवार को भी --
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