अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है ग़लत क्या और सही क्या.

शनिवार, 11 सितंबर 2010

सुना है...

"बबा,हो सकता है कि इस में तुम जीत जाओ, पर मक़सद हार जाएगा". तब ही समझ गया था कि ये आदमी अपनी जीत पर नहीं,समाज की जीत पर विश्वास करता है. दो तीन वर्ष ही हुए थे उनसे मुलाक़ात हुए. उन्हें देखते, उनके बारे में सुनते सुनते ना जाने कितने बरस हो गये थे. जो कुछ भी काला सफ़ेद सुना था उनके बारे में, वो देख भी रहा था,और अपनी बुद्धी की सीमारेखा में उसका आँकलन भी कर रहा था. उनके आन्दोलनरत कलाकार रूप और कवित्त पर टिप्पणी करने योग्य खुद को समझना मेरी मूर्खता होगी. उन्हं प्रिय कहना चाहूँगा, मार्गदर्शक कहना चाहूँगा,प्रेरणास्रोत कहना चाहूँगा. उन्होंने कई बार हमारी कोशिशों की पीठ थपथपाई और अनेकों बार दिशादर्शन के लिये उनके कान भी उमेठे. सुनता हूँ की भूतकाल में उनकी कोशिशों को इस तरह की सहूलियत नहीं मिली. इसके उलट, जब वो रंगभूमि की तलाश में थे, एक नामी गिरामी संस्था ने उनके लिये प्रवेश निषिद्ध किया. उनकी सारी अच्छाई , क़ाबिलियत, सादगी, क्षमता और व्यक्तित्व एक ओर, और उनकी मयनोशी एक ओर. तत्कालीन रंगकर्म के ठेकेदारों ने आदत को फ़ितरत से ज़्यादा महत्व दिया. रंग का सर्जक और दर्शक, दोनों ही लम्बे अर्से तक ऐसे स्रिजन से महरूम रहे, जो शायद हमारे इतिहास को और महत्वपूर्ण और सारगर्भित बनाता.

ये मसायले तसव्वुफ़,ये तेरा बयान ग़ालिब,
हम तुझे वली समझते,जो न बादाख़्वार होता.

नदी का रास्ता भी कोई रोक पाया है भला. उनके स्रिजन का बहाव चलता रहा, उनके गीत आन्दोलन का अपरिहार्य अंग बन गये, उनके हुड़के की थाप आन्दोलन का आह्वान बन गई और उनकी आवाज़ हज़ारों आन्दोलनकारियों की आवाज़ का पर्याय बन गयी. रंगकर्म से वंचित व्यक्तित्व जनकवि बन गया.

’दावानल’ में पढ़ा कि ८० के दशक में वो उत्तरकाशी के बाढ़्पीड़ितों की मदद करने वहाँ पहुँचे थे. मैं भी तब वहीं था. कक्षा १ के विध्यार्थी की कच्ची उम्र की यादें हैं, ज़रूरत के सामान से भरा एक झोला हमेशा तय्यार रहता था और गंगा की आवाज़ उग्र होते ही लोग बिना सोचे समझे ऊँची जगहों की तरफ़ दौड़ पड़ते थे. वो अपनी जान जोख़िम में डालकर औरों के जीवनरक्षण का ध्येय लिये वहाँ मौजूद थे. कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने जनान्दोलन का नेत्रत्व किया और उसके श्रेय स्वरूप ज़िन्दगी किराए के मकान में गुज़ार दी. फूल बोए, बाँट दिये, रहे काँटे सो सहेजकर अपने झोले में रख लिये, बीड़ी के बन्डल और दारू के अद्धे के साथ.

"मन मैला और तन को धोए.........". जुमले यूँ भी सुने हैं. "यार एक ऐसा समय भी आया जब गिर्दा नहाते ही नहीं थे...... मै...ले कपड़े........". सोचता हूँ क्या कारण रहा होगा? पाँच मिनट तो लगते हैं नहाने में, और एक बाल्टी पानी. ज़रूर वो लोगों को खुद से दूर रखना चाहते होंगे..., पर लोगों के लिये स्वयं को भूल जाने वाला व्यक्ति उन्हें अपने से दूर क्यों रखना चाहेगा? हो सकता है कुछ लोगों की उनके कलाकार के प्रति असहिष्णुता इस अबूझे विद्रोह का कारण रही हो. उन्होंने सोचा हो कि मैली सोच, मैले वतावरण, मैले पर्यावरण और मैले समाज में एक आदमी का बदन मैला रह जाने से क्या फ़र्क पड़ जाने वाला था. आखिर आत्मा तो उनकी साफ़ ही थी.

हर्षवर्धन

1 टिप्पणी:

  1. सच तो यही है कि इस मैले परिवेश में आत्मा मैली ना हो पाए...बहुत अच्छा लिखा है...बधाई

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