लुभाता है, सताता है, रुलाकर फिर हंसाता है, बिगाड़े भी, बनाता है, ऐसा हुक्काम है. पैसा. बड़े दरबार में , अदालतों में, और खुदा के घर, कभी आता था दबे पाँव, अब सरेआम है. पैसा. मुल्क ने मेरे भी, तस्वीर उसकी खींच डाली है, रिआया की, कुल जमा सोच का अंजाम है. पैसा. यही इक दूसरे पर आपकी उंगली उठाता है. मिले शहर के हर एक घर, मगर बदनाम है. पैसा. ज़रूरी बेज़रूरी,ये सभी, इसपर मुन्ह्स्सर है, तुम्हारी शख्सियत की तोल का आयाम है. पैसा.
हर्ष जी
जवाब देंहटाएंसटीक कहा आपने.....बुनियादी गुण इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ते :) ...करारा व्यंग ...आदमी और उसकी आदमियत पर
बहुत ही सुन्दर शब्द रचना
जवाब देंहटाएंनववर्ष की शुभकामनायें ।
सदा जी मुदिता जी बहुत बहुत शुक्रिया.
जवाब देंहटाएंसटीक ...सुन्दर शब्द चित्र
जवाब देंहटाएंनव वर्ष की शुभकामनाएँ
बिल्कुल सही.
जवाब देंहटाएंनववर्ष आपको शुभ हो...
वाह वाह, क्या सच्चाई बयान की है आपने.वो भी इतने कम शब्दों में.
जवाब देंहटाएंaur ab wo phir janwar hai yaa asur
जवाब देंहटाएंसंगीता जी ,सुशील जी ,कुंवर जी,रश्मि जी और संजय जी.
जवाब देंहटाएंआप से सुधिजन जब प्रेरणा देते हैं तो बल मिलता है.
धन्यवाद