वक्त के पाँव का वो आबला.
राह यारी की, कहाँ आसां है? कदम पर, सूख जाता है गला. कैसा? किसका? भला कहाँ का है? है जो आवारा बादल मनचला. करेगा कल की रोशनी की जुगत, आज जो सांझ का सूरज ढला. रही इंसानियत का वो टुकड़ा, मानिंद-ए-रोज़ फिर थोड़ा गला. रिसते रिसते कहानी लिखता है, वक्त के पाँव का वो आबला. आबला = छाला मानिंद-ए-रोज़=रोज़ की तरह.