संदेश

क्या?

बिक नहीं सकता जो, उस की क्या कीमत भाव लगे जिसका,फिर उस का मोल क्या। जूं भी न रेंगेगी          चीखों के बावजूद, बहरों के मुहल्ले में,मुनादी का ढ़ोल क्या। दिमाग़ कैसे  मापे, गहराई...

ग़ज़ल।

इश्क़ को जिसकी जुस्तजू हर दम उस मुलाक़ात का बहाना हूँ। कहाँ लायक हूँ मैं ज़माने के रस्म-ए-दुनिया को बस निभाना हूँ, मैं अदीबों के साथ रहता हूँ सुखनसाज़ी से आशिकाना हूँ। अदीब=लेखक...

आईना है ये कलाम.

कागज़ी संवेदना, है कागज़ी सब इंतज़ाम, कागज़ी नारे तुम्हारे, हैं कागज़ी वादे तमाम. है नहीं जो, बाँटते हो, आप वो लोगों के बीच, जो है वो, मिलबाँट कर खाएगा हमारा निजाम. मत के मतवालों ने कैसा कायदा ये कर दिया, नौकरों का घर पे कब्ज़ा और मालिक लामुकाम. हम तो डर जाते सिपाही दूर से ही देख कर, और अपना वो सिपाही चोर को करता सलाम. और कब तक ज़ब्त अपना आजमाते जाओगे? आज के हालात हैं अपनी ही चुप्पी का इनाम. हम भी बगलें झाँकते हैं शक्ल इसमें देखकर, आज की तारीख का एक आईना है ये कलाम. लामुकाम= बेघर. ज़ब्त=धैर्य. कलाम=कविता.

ग़ज़ल

                         ग़ज़ल हो गयी है पीर, पर्वत भी पिघलने लग गया, नींद में खलल पड़ा, इंसान पर क्या जग गया. तूने क्या बरबाद पूरा, घर पुराना कर लिया ? तू जो निकला ढूँढने, तारों में फ़िर इक घर नया. आज की इस ज़िंदगी का दायरा भी है अजीब, घर से निकला रिज़्क पर, रोटी कमाई घर गया. होने का जिसको गुमाँ था, लोग बोले उसके बाद, चार दिन वो भी जिया, सबकी तरह फ़िर मर गया. कनखियों से देखना वो, आपका मेरी तरफ़. यूँ लगा जैसे पुराना ज़ख्म कोई भर गया.

सतह पर.

सतह पर. तुम, जो दिखते भी नहीं हो, हावी रहते हो मुझपर. मुझपर, जो दिखता है. कितनी आसानी से बदल जाते हो तुम. दिल बन कर, करवा लेते हो वो, जो अतार्किक है. और कभी दिमाग बन कर, करवाते हो वह सब, जो तार्किक तो है, परन्तु निंदनीय. और सजा भोगता हूँ मैं. मैं, जो दिखता है, सतह पर.

तुमको और मुझको.

इंसानियत के नाते,अपनी ख़ुदी से प्यार, तुमको भी बेशुमार है,मुझको भी बेशुमार. चोर और लुटेरे में एक को चुन लें, तुमको भी इख़्तियार है, मुझको भी इख़्तियार. राज करने वाले,आला दिमाग़ पर, तुमको भी ऐतबार है, मुझको भी ऐतबार. हम पे चोट कुछ नहीं,मैं पे एक वार, तुमको भी नागवार है,मुझको भी नागवार. हालात को सुधारने आएगा मसीहा, तुमको भी इन्तज़ार है,मुझको भी इन्तज़ार.

खंज़र न मार.

मुफलिसी से बेदिली, पसरी थी घर में, चार सू, आज वो बाज़ार से, ले आया कुछ रुपयों का प्यार. जिस्म है, ज़मीर भी, ममता भी, बिकने में शुमार, वाह री दुनिया की तिज़ारत, आह इसका कारोबार. है सभी कुछ पास, या, कुछ भी नहीं है इसके पास, इक मरुस्थल के लिए, क्या है खिज़ा, है क्या बहार. लुट भी जाने दो, दीवाने को, भरे बाजार में, यार से, गमख्वार से,कब तक रहे वो होशियार. रहबरी से राहबर, बेज़ार मुझको यूँ न कर, थपथपाने के बहाने, पीठ पर खंज़र न मार. मुफलिसी=गरीबी, चार सू=हर तरफ़, तिज़ारत=व्यापार, खिज़ा=पतझड़, घम्ख्वार=दुःख का सांझेदार, रहबरी=नेतृत्व, राहबर=नेतृत्व करने वाला, बेज़ार=उदासीन.