संदेश

अखबार

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अखबार में लिपटी थी , कुछ दिन की बासी रोटी, अखबार कह रहा था , कम हो गयी गरीबी . गुलाब सी फितरत है, काँटों से घिर गया हूँ, जो काँटा चुभ रहा है, वो है मेरा करीबी. ताना बाना लेकर, जो पैरहन * बुनता है, उसका बदन है नंगा, ये कैसी बदनसीबी. मैं सारे ज़माने के रंगों से होली खेलूँ रंग अपना भूल जाऊँ, ऐसा न हो कभी भी. सब गुजर रहे हैं, लगता है कि वो गुजरा, है वक्त नाम जिसका, उसकी यही है खूबी. * वस्त्र. कार्टून बामुलाहिजा से साभार.

होली पर “ई-मेल”.

मैं भी सैंय्या समझ गयी हूँ इंटरनेट का खेल , इस होली भेजूँगी तुमको प्यार भरा “ ई - मेल ” . अबीर, गुलाल के दो थैले, “अटैच” कर दूँगी, इस होली बतला दूँगी मैं क्या है ये “फीमेल”. मैं भी सैंय्या समझ गयी हूँ इंटरनेट का खेल ........ “ट्विटर”, “फेसबुक”, पर अब मेरा, पता दर्ज है, जान रहूँगी क्या करते रहते हो दिन भर खेल. मैं भी सैंय्या समझ गयी हूँ इंटरनेट का खेल ......... “टाइमलाइन” और “वॉल” पे मैं, कर लूँगी कब्ज़ा, तेरे “सिंगल” इस्टेटस का “फंडा” होगा “फेल”. मैं भी सैंय्या समझ गयी हूँ इंटरनेट का खेल ............. “नोटीफिकेशन” और “मैसेज” पर पक्का पहरा होगा, यूँ ही शायद पड़ जाए कुछ, तेरी नाक नकेल. मैं भी सैंय्या समझ गयी हूँ इंटरनेट का खेल ............. हर्षवर्धन

दे दिया.

इतने भी हम खिलाफ़ नहीं तेरे, ऐ गरीब, तेरा शोर सुन के तुझको, खाना तो दे दिया. ताकत की हवाओं में ,उड़ जाएँ तेरे तीर, ये तय किया पर तुझको निशाना तो दे दिया. सब खर्च किया हमने ,तेरे ही नाम पर, नाम ही को सही ,तुझको खज़ाना तो दे दिया. भूखा है तू ,नंगा है तू ,पर पास बम तो है, ले तू भी फख्र कर ले ,बहाना तो दे दिया. हर हाल ज़िंदा रहना ,ही है तेरा मकसद, हर हाल ज़िंदा रहने ,ठिकाना तो दे दिया.

मकसद.

मेरा मकसद है मेरे राज पर न आँच आए, ये और बात मेरी बात सही हो कि न हो. जो हैं गरीब तो सदियों से मसीहा भी हैं, ये और बात है कंधों पे सलीब हो कि न हो. रोज़ी,रोटी,मकान,कपड़ा कागज़ों पर है, ये और बात है हमको नसीब हो कि न हो. फिज़ा में तैर रही एक बुज़ुर्ग बीन की धुन, ये और बात है भैसों पे असर हो कि न हो. राज लोगों का है लोगों के लिए लोगों से, ये और बात है लोगों की क़द्र हो कि न हो.

ऐसे ही.

बीच दोनों के एक इश्क की नदी है जरूर, यूँ समंदर को हिमालय नहीं पिघलते हैं. आन एक ऐसा खिलौना है,जिसकी खातिर, बुजुर्गवार भी बच्च्चों की ढब मचलते हैं. मेरे मंदिर के दिये,और तेरी मस्ज़िद के चिराग, बहुत आँधी चली पर साथ साथ जलते हैं. तुम अपनी रौ बहे तो हम भी अपनी रौ बहके, सम्हलते आप वहाँ हम यहाँ सम्हलते हैं. खुदा ही जाने के ये दोस्त कहाँ पहुँचेंगे, मंजिलें दो हैं, मगर साथ साथ चलते हैं. मेरे पैरों में है दस्तूर की ज़ंजीर मगर, मेरे अरमान इक उड़ान को मचलते हैं.