संदेश

और है.

दिल की फ़र्माइश है सर आँखों मगर, एक पूरी हो तो फ़िर इक और है. ख़त्म सुनता था हुए राजा नवाब, पर हक़ीक़ी वाक़या कुछ और है. आदमी अब क्या करे शर्मो लिहाज, जिस भी सूरत जीतने का दौर है. तुम भले इन्कार कर लो आग से, कह रहा उठता धुवाँ कुछ और है. बेअसर है झिंगुरों का सा रियाज़, सुर को साधे जो गला कुछ और है. खुश वो,जो बिक जाए ऊँचे दाम में, आज तो बाज़ार ही सिरमौर है.

बदगुमान कहे.

अता हुआ है आदमी को ऐसा मुस्तक्बिल, पा जाये सब, मगर पा कर भी परेशान रहे. फ़िक्र में डूब रहे सब अदीब-ओ-दानिशमन्द, एक ग़ाफ़िल को मगर पूरा इत्मिनान रहे. कहर देखा तेरा, तेरी नवाज़िशें देखीं, कोइ दो चार दिन हम भी तेरे मेहमान रहे. कोई तो सीख गया चन्द किताबी बातें. किसी के हिस्से ज़िन्दगी के इम्तिहान रहे. आज जी आया जी भर के जी की बात कहूँ, जी में आए तो मुझे कोई बदगुमान कहे.

खेल खेल में.

हमारे देश में आजकल ४ खेल चर्चा में हैं. इनमें से २ अन्तर्राष्ट्रीय हैं और २ राष्ट्रीय. कामनवेल्थ और आतंकवाद अन्तर्राष्ट्रीय खेल हैं, जिनमें परस्पर प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है. अयोध्या पर फ़ैसला एवं बाढ़ राष्ट्रीय खेल हैं, जिनमें परस्पर यह सम्बन्ध है कि दोनों ही मासूम ज़िन्दगियाँ लीलने को आतुर हैं. इन ४ खेलों के बहाने कई ’उप-खेल’ भी खेले जा रहे हैं जिन से समाज के अगुवाओं के आर्थिक एवं राजनीतिक लाभ पर असर पड़ता है. इन खेलों से आम जनों के जीवन पर भी व्यापक असर पड़ता है परन्तु वह महत्वपूर्ण नहीं माना जाता. उनके जीवन पर तो छोटी-छोटी बातों,उदाहरण के लिये-तेल के दाम बढ़ जाना अथवा गोदामों की कमी के कारण अनाज का सड़ जाना, से भी व्यापक असर पड़ जाता है. तो पहले हम अन्तर्राष्ट्रीय खेलों की बात करते हैं. राष्ट्रकुल उन राष्ट्रों का समूह है जो कभी साम्राज्यवादी युग में ब्रितानी हुकूमत के आधीन थे. यह देश आपस में खेल खेलते हैं. इन खेलों के आयोजन को ’कामनवेल्थ गेम्स’ कहा जाता है. बड़ी मुश्किलों से हमारा देश इस बार इन खेलों के आयोजन पर अधिकार कर पाया है. कहा जाता है कि इस आयोजन से देश में पर्यटकों की संख्...

सुना है...

"बबा,हो सकता है कि इस में तुम जीत जाओ, पर मक़सद हार जाएगा". तब ही समझ गया था कि ये आदमी अपनी जीत पर नहीं,समाज की जीत पर विश्वास करता है. दो तीन वर्ष ही हुए थे उनसे मुलाक़ात हुए. उन्हें देखते, उनके बारे में सुनते सुनते ना जाने कितने बरस हो गये थे. जो कुछ भी काला सफ़ेद सुना था उनके बारे में, वो देख भी रहा था,और अपनी बुद्धी की सीमारेखा में उसका आँकलन भी कर रहा था. उनके आन्दोलनरत कलाकार रूप और कवित्त पर टिप्पणी करने योग्य खुद को समझना मेरी मूर्खता होगी. उन्हं प्रिय कहना चाहूँगा, मार्गदर्शक कहना चाहूँगा,प्रेरणास्रोत कहना चाहूँगा. उन्होंने कई बार हमारी कोशिशों की पीठ थपथपाई और अनेकों बार दिशादर्शन के लिये उनके कान भी उमेठे. सुनता हूँ की भूतकाल में उनकी कोशिशों को इस तरह की सहूलियत नहीं मिली. इसके उलट, जब वो रंगभूमि की तलाश में थे, एक नामी गिरामी संस्था ने उनके लिये प्रवेश निषिद्ध किया. उनकी सारी अच्छाई , क़ाबिलियत, सादगी, क्षमता और व्यक्तित्व एक ओर, और उनकी मयनोशी एक ओर. तत्कालीन रंगकर्म के ठेकेदारों ने आदत को फ़ितरत से ज़्यादा महत्व दिया. रंग का सर्जक और दर्शक, दोनों ही लम्बे अर्से तक...

परिभाषाएँ

पन्द्रह अगस्त और छ्ब्बीस जनवरी को, झन्डा फ़हराकर देशप्रेम के गीत सुनना, देशभक्ति कहलाता है. पर्यावरण दिवस पर पौधे रोपकर, उन्हें हमेशा के लिये भूल जाना, व्रिक्षारोपण कहलाता है. जनप्रतिनिधियों का स्वयमेव, अपनी तनख़्वाह तय कर लेना, प्रजातन्त्र कहलाता है. परस्पर हित साधन के लिये, दो व्यक्तियों का आपसी सम्पर्क, मित्रता कहलाता है. नरभक्षियों द्वारा अपना भोजन, काँटे-छुरी प्रयोग कर खाना, विकास कहलाता है. क्रमशः

गिर्दा

तुम हमेशा पहाड़ में रहे, उसके सभी सरोकारों में रहे, चाहते तो सरोकारों की जगह, सरकारों में भी रह सकते थे. बाढ़ पर उत्तरकाशी रहे, पेड़ कटने पर जंगल में. भीड़ में लाठियाँ खाते रहे, भीड़ पर राज कर सकते थे. तुम जन की आवाज़ में रहे, आवाज़ के शब्दों में रहे, होली गाई, तो जाग्रिति की, रंग बरसे भी गा सकते थे. तुम इतिहास बनते-बनाते रहे. तुम विश्वास बनते बनाते रहे. हमेशा सुनाई,मनवाई नहीं, चाहते तो मनवा सकते थे. तुम लिखते लिखते गीत हो गए, तुम गा गा कर संगीत हो गए, तुम रंगकर्मी के कर्म में रहे, उसके ग़ुरूर में रह सकते थे. पहाड़ का सरोकार,पहाड़ के जन की आवाज़,पहाड़ का गीत मर नहीं सकता.गिर्दा तुम मर नहीं सकते.तुम ज़िन्दा हो और सदा रहोगे.

बखतक दगिड़ हिटौ.?

पछिनैं छूट जाला,बखतक दगिड़ हिटौ, नान्तरी पछताला,बखतक दगिड़ हिटौ. बखतैकि सारी माया,बखतैकि धूप छाया, बखतक हँसी आँसू,बखतक दगिड़ हिटौ. बखतैली घाव करौ,बखतैली घाव भरौ, बखतैकीं कैल जितौ,बखतक दगिड़ हिटौ. बखतैल राज बणाईं,बखतैल रंक करौ, बखतैल राज करौ,बखतक दगिड़ हिटौ. बखतैल भगत देखौ,भगतैल बखत देखौ, अफ़ुँ लै बखत देखौ,बखतक दगिड़ हिटौ. बखतैल न्योल गाई,बखतैल झ्वाड़ लगाईं, बखत ’कमीना’ गानौ,बखतक दगिड़ हिटौ.