संदेश

ओ बादल

ओ बादल,आजकल तुम हमारे शहर का रास्ता भूल गये हो , कभी आ भी जाते हो तो बरसना,भिगोना भूल जाते हो. तुम आओगे,ये सोचकर हमने चार लेन की सड़कें बनाईं, स्वागत देखना छोड़,तुम काटे गये पेड़ों को गिनते रहते हो. हमने तुम्हारे लिये गाड़ियाँ बनाई,आराम से आओगे सोचकर, गाड़ि छोड़,तुम गाड़ी के पीछे छूटने वाला धुआँ देखते रहते हो. हमने तुम्हारी सहूलियत के लिये एसी का इन्तजाम भी किया, हमारी नीयत देखना छोड़,तुम पर्यावरण वाले गीत गाते रहते हो. ओ बादल,आजकल तुम चुनावी नेता जैसा बर्ताव करने लगे हो, घुमड़ कर आते हो,गरज कर आश्वासन देते हो,मुड़कर चले जाते हो. अब हम जंगल काट कर वहाँ नई सड़कें बनाने में लगे हुए हैं, शहर की सड़कें देख कर नाराज़ हो,क्या पता इस रास्ते से आ जाओ.

गड़बड़ा

वो आमतौर पर जो लोग बड़बड़ाते हैं, हम उसे शेर बता,तुमको गड़बड़ाते हैं. ज़रा रुक और दिल में झाँक कर देख, कितने अरमान यहाँ पंख फड़्फड़ाते हैं. अपने हालात में क्या क्या पचाए बैठे हैं, ग़ुस्सा आ भी जाए,यों ही बड़बड़ाते हैं. बसंत रुत में जब फूल नए आते हैं, वो कहीं बैठ कर हिसाब गड़बड़ाते हैं. वो उनके हाथ में चप्पू मेरी नाव का है, ज़रा सी तेज़ हवा में जो हड़्बड़ाते हैं. यहाँ तो शाह का ईमान डोल जाता है, ग़नीमत है मेरे बस पैर लड़खड़ाते हैं.

म्यर कूमाऊँ का.

हरिया यो पहाड़ा.. कूमाऊँ का, सीढ़ीदारा खेत देखो म्यर गौं का. वाँ चाओ कैसी है रै बहारा, बाट लागि छन यो नौला गध्यारा. लाल गाल ठुम्कि चाल. लाल गाल ठुम्कि चाल, म्यर कूमाऊँ का. हरिया यो पहाड़ा.. कूमाऊँ का, सीढ़ीदारा खेत देखो म्यर गौं का. कोयलै कूक और घूघुति पुकारा सुरीलि हवा में झूमनि द्योदारा सुर-ताल हाय कमाल, सुर ताल हाय कमाल, म्यर कूमाऊँ का. हरिया यो पहाड़ा.. कूमाऊँ का, सीढ़ीदारा खेत देखो म्यर गौं का. हिमाला का पाणी अम्रितै धारा, याँ धूप गुनगुनी छू ठन्डी बयारा, जो लै आल गीत गाल जो लै आल गीत गाल. म्यर कूमाऊँ का. हरिया यो पहाड़ा.. कूमाऊँ का, सीढ़ीदारा खेत देखो म्यर गौं का. बुराँश फ़ुलि रूँ जस लाल अनारा, काफ़ला हिसालु की बात छु न्यारा, ...

लोग

संगीत सभा में, सम से दो मात्रा पहले, ताली देने वाले लोग. उन्यासी या इक्यासी, अंगेज़ी में बताओ, कहने वाले लोग. अपनी धुन छोड़, पराई धुन पर, थिरकने वाले लोग. मंदिर की क़तारें तोड़कर, दर्शन पा कर, धन्य होने वाले लोग. रात के अंधेरे में, तरह तरह से, लूट लेने वाले लोग. तिफ़्ल को कूड़ेदानों, पर बेफ़िक्र होकर, फ़ेंक जाने वाले लोग. महापंचयतों में, विभिन्न मुद्राओं में, मुद्रा लहराने वाले लोग. घर की ख़बरें, साहूकार के पास, देकर पाने वाले लोग. एक ख़बर को, बहुत बेख़बरी से, दबा देने वाले लोग. मेरे और आप से, दुनिया में रहने वाले, दुनिया के वाले लोग. हर्षवर्धन.

शराब

मुझको मत पी बहुत खराब हूँ मैं, तुझको पी जाउँगी,शराब हूँ मैं. मेरा वादा है अपने आशिकों से, रुसवा कर जाउँगी,शराब हूँ मैं. है बदन और दिमाग़ मेरी गिज़ा, नोश फ़रमाउँगी,शराब हूँ मैं. तुम मुझे क्या भला ख़्ररीदोगे, तुम को बिकवाउँगी,शराब हूँ मैं.

ब्लाग

उसने ब्लाग पर , अपनी पहली कविता सुबह सात बजे पोस्ट की थी. उसकी सोच के, सीमान्त तक भी, कविता में कोई नुक़्स, ढूँढे नहीं मिलता था. कविता में व्यंग, अपनी गुदगुदाती, चुभाती,चिढाती, अदा के साथ मौज़ूद था. टैक्नीकली भी, उसे हिन्दी मास्साब, ने विश्वास दिलाया, कविता ऐब्सोल्यूट्ली फ़्लौलेस थी. उसे विश्वास था, वो विशिष्ठ मस्तिष्कों, के आकर्षण का केन्द्र, बन जाने के लायक कविता थी. कविता में, पहाड़ी नदी की, लय थी,चंचलता थी, कविता अनूठी थी ऐसा वो सोचता था. खैर..... कविता पोस्ट करते ही, उसने इन्टर्नेट की, दुनिया में विचरने वाले, सभी परिचित प्राणियों को, पोक करके,वौल पर लिख कर, मैसेज से और ई-मेल से, सूचित कर दिया. उसे कौमेन्ट्स की पतीक्षा थी, ढेर सारे कौमेन्ट्स, तालियों जैसे कौमेन्ट्स, पंखों जैसे कौमेन्ट्स, स्पाट लाइट जैसे कौमेन्ट्स. बार बार पेज रीफ़्रेश, करता था और नज़र, जाती थी कौमेन्ट्स पर, उम्मीदों से भरी नज़र, पर लौट आती थी निराश. हम फ़लाँ वेब्साइट पर, आपका स्वागत करते हैं, बस एक यह मैसेज, उसे कुरुपा के मुँह चिढाते, आईने जैसा लगने लगा था. तीन घण्टे...... और एक भी कौमेन्ट, पोस्ट पर न था, जी ब...

दोस्ती ख़त्म.

तुम्हारी मेरी दोस्ती आज से ख़त्म. कारण. जब भी दाद की आरज़ू में मैंने कोइ शेर पढ़ा , तुम और सभी लोगों की तरह खामखाँ हँसते रहे. तुम्हारी ईमानदारी ने तुम्हारा हाजमा खराब किया है, मेरा ज़रा सा झूठ तुम्हारे पेट में ऐंठन पैदा करता है. तुम मेरे अहं की ज़रा सी भी परवाह नहीं करते हो, मेरी मदद लेने में तुम्हारी खुद्दारी आड़े आ जाती है. मैं सारा दिन जिन सुडोकू पहेलियों को सुलझाता हूँ, उन्हें तुम बेदर्दी से वक़्त की बर्बादी करार देते हो. मैं सुभीते के साथ अपने पिता के पैरों पर चलता हूँ, तुम मुझे खुद के पैरों पर खड़े होने की सलाह देते हो. जो डिग्रियाँ मेरे बैठक की दीवरों पर शान से सजी हैं, तुम जानते हो उन्हें मैंने किन तरकीबों से हासिल किया है. मौका आने पर तुमने हमेशा नमकीन की पेशकश की, असली मद का खर्च हमेशा मेरी ही जेब से हुआ. इसलिये तुम्हारी मेरी दोस्ती आज से ख़त्म हर्षवर्धन.