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AKBARI LOTA | ANNPURNANAND VARMA | अकबरी लोटा | अन्नपूर्णानंद वर्मा | Ha...

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बेईमानी की परत | हरिशंकर परसाई | Beimani Ki Parat | Harishankar Parsai

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कबिरा आप ठगाइये | हरिशंकर परसाई | Kabira Aap Thagaiye | Harishankar Parsai

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राम सिंह की ट्रेनिंग | हरिशंकर परसाई | RAMSINGH KI TRAINING | HARISHANKA...

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PITNE PITNE MEIN FARQ | HARISHANKAR PARSAI | पिटने पिटने में फ़र्क | हरिश...

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मधुशाला पर आधारित #व्यंग्य #पैरौडी

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मधुशाला पर आधारित #व्यंग्य #पैरौडी मदिरालय जाने को घर से की तर्ज़ पर 👇 पोल बूथ जाने को घर से निकला मत देने वाला मत किसको दूँ किसको मत दूँ सोच रहा भोलाभाला। अलग अलग रंग के झंडे हैं एक मगर सबका नारा हर प्रत्याशी कुर्सी चाहे सत्ता चाहे मतवाला। मदिरालय जाने को घर से की तर्ज़ पर 👇 शाम ढले जब टी वी खोले, मध्यमवर्गी घरवाला, न्यूज़ देखने को वह आतुर, गल्प करे एंकरबाला, है विकल्प उसके हाथों में ले रिमोट वह सोच रहा टी आर पी से सब संचालित, क्या जाने भोला भाला। सुन कल-कल छल-छल की तर्ज़ 👇 सुन यू पी में बबुआ ओ बुआ, हमप्याला हमनिवाला, सुन साईकिल चलती,हाथी संग, क्या है ये गड़बड़ झाला। बस सत्ता तक, और नहीं, कुछ ही महीने संग चलना है, राजनीति का मन्त्र पुराना, गठबंधन ढीला ढाला। लालायित अधरों से जिसने की तर्ज़ पर 👇 लालच में आ कर के जिसने, जनता को ठग ना डाला, कुरसी पर बैठेगा कैसे, वो सज्जन भोला भाला। धर्म जाति का गर न अब तक, मारक इस्तेमाल किया...

हिंदी कवि हरिवंश राय बच्चन की अमर कृति "मधुशाला" भाग 4.

हिंदी कवि हरिवंश राय बच्चन की अमर कृति "मधुशाला" भाग 4.

कभी कभी यों भी हमने... निदा फाजली के इस कलाम को जगजीत सिंह ने अपनी धुन से संवारा है.

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कभी कभी यों भी हमने... निदा फाजली के इस कलाम को जगजीत सिंह ने अपनी धुन से संवारा है. कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें की घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है

कवि हरिवंश राय बच्चन की अमर कृति मधुशाला भाग 3

मधुशाला भाग 3.

कवि हरिवंश राय बच्चन की अनमोल कृति 'मधुशाला; भाग २.

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गरीब उद्योगपतियों को नकतालीस प्रतिशत आरक्षण.

सदन की पहली मंजिल के सभी सदस्य बिल से पास हए. कुछ उसके अन्दर घुसे बिना ही पास हो गए. ऊपरी मंजिल के सदन में चर्चा जारी है की क्या मोटे सदस्य इस बिल में घुस पाएँगे? कुछ मोटे सदस्यों ने बिल में घुसने का प्रयत्न किया. इन में से ज्यादातर सदस्य इस बिल में घुस कर बाहर निकल गए. उन्होंने कहा कि बाप रे! बिल में घुसकर ही पता चलता है की कितना सफोकेशन (दमघोंटू वातावरण ) है. उनका कहना था की बात यदि गरीब उद्योगपतियों की न होती तो इस बिल के दमघोंटू वातावरण के कारण वो इस बिल से गुजरने का यत्न कभी न करते. बिल बनाने वाले सदस्यों ने कहा की बिल बनाना ज़रूरी था, इसलिए बना दिया,जैसा बना है वैसा ही ठीक है.अभी कुछ सदस्य बिल से गुजरने बाकी हैं परन्तु उनका कहना है कि जैसे तैसे वो भी गुज़र ही जाएँगे.

माइक्रोवेव खरीद घोटाला...

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माइक्रोवेव खरीद घोटाला. इस सामूहिक परिवार की कमान कुछ समय से ताउजी के पास है. घर की सामान्य बैठक में माताजी ने बताया कि वो पिछले कई दिनों से किचन के लिए एक माइक्रोवेव चाहती हैं. छोटे चाचा ने बताया कि इस इस विषय पर दस्सू इलेक्ट्रॉनिक्स वालों से बात चल ही रही थी कि घर की कमान ताऊजी के पास चले गयी,वैसे दस्सू इलेक्ट्रॉनिक्स वालों ने पाँच हज़ार का कोटेशन दिया था और यह कि इन्सटौल करने की बात दामाद जी से तय हुई थी. ताऊजी ने बताया कि दस्सू इलेक्ट्रॉनिक्स वालों से सौदा तय हो गया है.माइक्रोवेव बस आता ही है. छोटे चाचा ने ताऊजी से पूछा कि कितने में सौदा तय हुआ और इन्सटौल कौन करेगा. ताऊजी ने बताया कि रेट नहीं खोला जा सकता, दस्सू इलेक्ट्रॉनिक्स वालों ने मना किया है.उन्होंने बताया कि हमें दस्सू इलेक्ट्रॉनिक्स वालों ने सस्ते में माइक्रोवेव देने का वादा किया है और अगर रेट खुल गया तो दस्सू इलेक्ट्रॉनिक्स वालों को सभी ग्राहकों को इस ही रेट में देना पडेगा.यह भी बताया कि इन्सटौल करने मौसी का बेटा आ रहा है. बड़े चाचा ने कहा कि चूँकि माइक्रोवेव सामूहिक कमाई से खरीदा जाना है इसलिए ताऊजी को रेट...

कवि हरिवंश राय बच्चन की महान कृति 'मधुशाला'.भाग १.

क्या?

बिक नहीं सकता जो, उस की क्या कीमत भाव लगे जिसका,फिर उस का मोल क्या। जूं भी न रेंगेगी          चीखों के बावजूद, बहरों के मुहल्ले में,मुनादी का ढ़ोल क्या। दिमाग़ कैसे  मापे, गहराई...

ग़ज़ल।

इश्क़ को जिसकी जुस्तजू हर दम उस मुलाक़ात का बहाना हूँ। कहाँ लायक हूँ मैं ज़माने के रस्म-ए-दुनिया को बस निभाना हूँ, मैं अदीबों के साथ रहता हूँ सुखनसाज़ी से आशिकाना हूँ। अदीब=लेखक...

आईना है ये कलाम.

कागज़ी संवेदना, है कागज़ी सब इंतज़ाम, कागज़ी नारे तुम्हारे, हैं कागज़ी वादे तमाम. है नहीं जो, बाँटते हो, आप वो लोगों के बीच, जो है वो, मिलबाँट कर खाएगा हमारा निजाम. मत के मतवालों ने कैसा कायदा ये कर दिया, नौकरों का घर पे कब्ज़ा और मालिक लामुकाम. हम तो डर जाते सिपाही दूर से ही देख कर, और अपना वो सिपाही चोर को करता सलाम. और कब तक ज़ब्त अपना आजमाते जाओगे? आज के हालात हैं अपनी ही चुप्पी का इनाम. हम भी बगलें झाँकते हैं शक्ल इसमें देखकर, आज की तारीख का एक आईना है ये कलाम. लामुकाम= बेघर. ज़ब्त=धैर्य. कलाम=कविता.

ग़ज़ल

                         ग़ज़ल हो गयी है पीर, पर्वत भी पिघलने लग गया, नींद में खलल पड़ा, इंसान पर क्या जग गया. तूने क्या बरबाद पूरा, घर पुराना कर लिया ? तू जो निकला ढूँढने, तारों में फ़िर इक घर नया. आज की इस ज़िंदगी का दायरा भी है अजीब, घर से निकला रिज़्क पर, रोटी कमाई घर गया. होने का जिसको गुमाँ था, लोग बोले उसके बाद, चार दिन वो भी जिया, सबकी तरह फ़िर मर गया. कनखियों से देखना वो, आपका मेरी तरफ़. यूँ लगा जैसे पुराना ज़ख्म कोई भर गया.

सतह पर.

सतह पर. तुम, जो दिखते भी नहीं हो, हावी रहते हो मुझपर. मुझपर, जो दिखता है. कितनी आसानी से बदल जाते हो तुम. दिल बन कर, करवा लेते हो वो, जो अतार्किक है. और कभी दिमाग बन कर, करवाते हो वह सब, जो तार्किक तो है, परन्तु निंदनीय. और सजा भोगता हूँ मैं. मैं, जो दिखता है, सतह पर.

तुमको और मुझको.

इंसानियत के नाते,अपनी ख़ुदी से प्यार, तुमको भी बेशुमार है,मुझको भी बेशुमार. चोर और लुटेरे में एक को चुन लें, तुमको भी इख़्तियार है, मुझको भी इख़्तियार. राज करने वाले,आला दिमाग़ पर, तुमको भी ऐतबार है, मुझको भी ऐतबार. हम पे चोट कुछ नहीं,मैं पे एक वार, तुमको भी नागवार है,मुझको भी नागवार. हालात को सुधारने आएगा मसीहा, तुमको भी इन्तज़ार है,मुझको भी इन्तज़ार.

खंज़र न मार.

मुफलिसी से बेदिली, पसरी थी घर में, चार सू, आज वो बाज़ार से, ले आया कुछ रुपयों का प्यार. जिस्म है, ज़मीर भी, ममता भी, बिकने में शुमार, वाह री दुनिया की तिज़ारत, आह इसका कारोबार. है सभी कुछ पास, या, कुछ भी नहीं है इसके पास, इक मरुस्थल के लिए, क्या है खिज़ा, है क्या बहार. लुट भी जाने दो, दीवाने को, भरे बाजार में, यार से, गमख्वार से,कब तक रहे वो होशियार. रहबरी से राहबर, बेज़ार मुझको यूँ न कर, थपथपाने के बहाने, पीठ पर खंज़र न मार. मुफलिसी=गरीबी, चार सू=हर तरफ़, तिज़ारत=व्यापार, खिज़ा=पतझड़, घम्ख्वार=दुःख का सांझेदार, रहबरी=नेतृत्व, राहबर=नेतृत्व करने वाला, बेज़ार=उदासीन.